भारत के लिए वित्तीय स्थिरता है जरूरी, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने इसलिए कही ये बात
*भारत के लिए वित्तीय स्थिरता है जरूरी, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने इसलिए कही ये बात*
उपसभापति ने कहा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2047 तक भारत को विकसित देश बनाने का लक्ष्य रखा है। जब सभी राज्य सामूहिक रूप से आर्थिक विकास पर ध्यान केंद्रित करेंगे, तभी यह साकार होगा।
राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने मंगलवार को पटना में अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन के सत्र को संबोधित किया। उप सभापति ने अपने संबोधन में विधायिका में बजट की प्रभावी जांच, आमद व खर्च पर बारीकी से बहस के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आर्थिक विकास के लिए पार्टियों के बीच राजनीतिक सहमति होनी चाहिए और देश की वित्तीय सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा की तरह ही प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
उपसभापति ने कहा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2047 तक भारत को विकसित देश बनाने का लक्ष्य रखा है। जब सभी राज्य सामूहिक रूप से आर्थिक विकास पर ध्यान केंद्रित करेंगे, तभी यह साकार होगा। इसलिए विधायिकाओं को यह जांचना चाहिए कि उनके संबंधित राज्यों में बजट कुशलतापूर्वक आबंटित किया जा रहा है या नहीं और कर्ज का बोझ तो नहीं बढ़ रहा है। यदि हम आर्थिक शक्ति बनना चाहते हैं, तो हमें लोकलुभावन खर्चों से दूर रहने के लिए नए सिरे से राजनीतिक सहमति बनानी होगी।
उन्होंने याद दिलाया कि भारत 1991 में चुनौतीपूर्ण अर्थसंकट दौर से गुजर चुका है। गलत आर्थिक नीतियों के कारण हम कंगाल होने की कगार तक पहुंचे। भारत में आर्थिक संकट की यह घड़ी रातोंरात अचानक नहीं आयी थी। आवश्यक आर्थिक सुधारों को 1985 के बाद के सत्ता के ताकतवर लोगों ने लागू नहीं किया। सत्ता मोह के कारण। उस समय के शीर्ष अर्थशास्त्रियों और सरकार के सलाहकारों ने इस देरी के बारे में लिखा है, जिसने अंततः हमें कंगाली के कगार पर पहुंचा दिया था। प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर ने इस संकट के समाधान के लिए कदम उठाया।
कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए उन्होंने आगे कहा भारतीय रिज़र्व बैंक ने हाल के दिनों में राज्यों द्वारा खर्च प्रतिबद्धता की चुनौतियों के बारे में आगाह किया है, जो ऋण बोझ को बढ़ा सकते हैं। अक्सर बजट के अधिक आबंटन की मांग के बारे में हमने विधायिका की बहसों में सुना है, लेकिन खर्च के लिए धन कहां से आये? राजस्व कैसे बढ़ाया जाए, इस पर शायद ही विधायिका में कोई सुझाव रखता है।
अपने संबोधन में उपसभापति ने विधायकों को सदन में अपने आचरण पर आत्मनिरीक्षण करने की आवश्यकता पर प्रमुखता से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा, पुराने समय में प्रचंड बहुमत वाली सरकारें हुआ करती थीं, फिर भी विपक्ष में जो चुनिंदा सदस्य होते थे, वे अपनी बात प्रभावी ढंग से रखने और अपनी असहमति को गरिमापूर्ण ढंग से प्रस्तुत करने में सक्षम थे। आज व्यवधान की बढ़ती प्रवृत्ति से पता चलता है कि हम सम्मानपूर्वक असहमत होना भूल गए हैं।
85वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों की बैठक की थीम 'संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करने में विधायी संस्थानों की भूमिका' थी। अपने संबोधन में उपसभापति ने लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने में संविधान सभा के काम और इस प्रक्रिया में बिहार के सदस्यों द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका को भी याद किया। उन्होंने कहा कि भारत का संविधान लचीला और समय की जरूरतों के अनुरूप बना हुआ है। उन्होंने आगे कहा कि विधायिकाओं को संविधान के इस विकास को एक सतत प्रक्रिया के रूप में देखना चाहिए और भविष्य के लिए कानूनों पर भी विचार करना चाहिए।