विशेष लेख - 18 शहरों में जनआंदोलन के बीच चीन में तूफ़ान से पहले की शांति छाई
नई दिल्ली । चीन में पूर्व राष्ट्रपति जियांगज़ेमिन की मौत के बाद भी कोरोना को रोकने के लिये सख्त लॉकडाउन की हालत अब भी जस की तस बनी हुई है। शी जिनपिंग सख्त कोविड नीति से पीछे हटने को तैयार नहीं है तो वहीं दूसरी तरफ़ जनता अब और सहने के मूड में नहीं है। जनता और पुलिस के बीच ठनी हुई है, इतने बड़े जनसैलाब के आंदोलन को चीन ने वर्ष 1989 में थ्येनआनमेन चौराहा आंदोलन के बाद देखा है। उस समय तानाशाहों ने अपनी निहत्थी जनता पर टैंक चलाने में भी गुरेज़ नहीं किया था जिसमें मुख्यत: सभी आंदोलनकारी विद्यार्थी थे। इस समय लोगों का गुस्सा शी चिनफ़िंग की नीतियों को लेकर तो है ही, शिनच्यांग वेवूर स्वायत्त प्रांत की राजधानी उरुमुछी की एक इमारत में आग लगने से 10 लोगों की मौत के विरोध में भी लोग जगह जगह इकट्ठा हो कर अपना शोक जता रहे हैं।
इस आंदोलन के पीछे और भी कारण हैं जिनकी वजह से लोग सीपीसी की तानाशाही और शी जिनपिंग की क्रूर नीतियां शामिल हैं।
वर्ष 2022 में चीन की फ़िज़ा बदली हुई है, चीन की अर्थव्यवस्था बुरे दौर से गुज़र रही है, विनिर्माण का काम रुका हुआ है, आपूर्ति श्रृंखला बाधित है, शून्य लॉकडाउन की नीति को सख्ती से लागू किया जा रहा है। महंगाई बढ़ रही है, चीन में इस समय बेरोज़गारी चरम पर है, जो 20% तक पहुंच चुकी है, प्रॉपर्टी बाज़ार का बुलबुला फूट चुका है, बैंक दिवालिया हो रहे हैं, लोगों के पास खाने तक को पैसे नहीं हैं, जिनके पास नौकरी है वो काम के दबाव से बचने के लिये काम नहीं करना चाहते, उद्यमियों पर सरकारी शिकंजा कसता जा रहा है, ऐसे में लोगों का सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन करना स्वाभाविक है, लेकिन सरकार इस तरह के हालात देखना नहीं चाहती है। हांगकांग में तो चीन सरकार ने सख्ती से लोकतांत्रिक आंदोलन को दबा दिया लेकिन ये तो चीन की मुख्य भूमि है जहां पर 13 शहरों में और 80 विश्वविद्यालयों में विद्यार्थी, युवा और आम जनता सभी सड़कों पर उतर आए हैं, अपने तानाशाह की गलत नीतियों को और नहीं सहना चाहते, अब वो तानाशाह को उसकी गद्दी से हटाना चाहते हैं और तानाशाह न तो गद्दी छोड़ना चाहता है और न ही अपनी नीतियों को वापस लेना चाहता है क्योंकि वो खुद को पॉलिटिकली करेक्ट दिखाना चाहता है। शी चिनफ़िंग इस समय एक ऐसे शेर पीठ पर बैठे हैं जिसकी दिशा और गति दोनों उनके काबू में नहीं है। शी चिनफ़िंग अपनी नीतियों को वापस लेकर अपनी दुर्दशा ह्वा कुओफ़ंग जैसा नहीं करवाना चाहता।
इस समय चीन दुनिया में संभवत: अकेला ऐसा देश है जहां पर कोरोना महामारी को लेकर सख्त लॉक़डाउन जारी है, पिछले तीन वर्षों से इतने सारे प्रतिबंधों के साथ रहते हुए लोग अब विद्रोह पर उतर आए हैं। कोविड मरीज़ों को बदहाल क्वारंटाइन में रखा जा रहा है जहां पर उन्हें सड़ा गला खाना दिया जा रहा है क्योंकि काम करने वाले लोग बहुत कम है, बच्चों को उनके माता-पिता से जबरन अलग रखा जा रहा है, कई मामलों में बुज़ुर्ग अपने घरों में अकेले बिना किसी की सहायता के अपनी जान से हाथ धो रहे हैं। अमेरिका से व्यापारिक संघर्ष के कारण चीन को पहले ही बड़ा आर्थिक नुकसान हो रहा था लेकिन वो अपने मीडिया के ज़रिये दुनिया को ये दिखाने की कोशिश करता रहा कि इस व्यापार संघर्ष से सिर्फ़ अमेरिका को नुकसान हो रहा है और चीन को कोई फ़र्क नहीं पड़ा। सख्त लॉकडाउन से फैक्टरियों में ताले जड़े हुए हैं, जो तैयार माल बंदरगाहों पर पड़ा है लॉकडाउन के चलते उन्हें जलपोतों में लादने वाले ट्रक डाइवर भी काम पर नहीं जा सकते। चीन के ग्राहक देशों ने अपने नए वेंडर तलाशकर अपना काम चलाना शुरु कर दिया है।
एवरग्रांडे और कंट्री गार्डेन समेत चीन के सारी बड़ी रीयल एस्टेट कंपनियां दिवालिया हो चुकी हैं। क्योंकि लोगों ने अपना पैसा मकानों, भवनों, शॉपिंग मॉल के निर्माण में लगाना बंद कर दिया है। इसके चलते चीन के चार कृषि बैंक दिवालिया हो चुके हैंजिनमें ऐग्रीकल्चरल बैंक ऑफ़ चाइना प्रमुख है, इन बैंकों में जमा लोगों के पैसे फ़्रीज़ किये जा चुके हैं, क्योंकि लोग अपने पैसे इन बैंकों से निकालने लगे थे, इसके बाद हेनान प्रांत में लोग सड़कों पर उतर आए, वो बैंकों का घेराव करने लगे, बैंक से अपने पैसे मांगने लगे लेकिन चीन सरकार ने बदले में अपने सुरक्षा कर्मियों को भेजा और सड़कों पर थ्येनआनमेन चौराहे वाली घटना के बाद पहली बार लोगों से बैंकों की रक्षा के लिये सेना के टैंकों को सड़कों पर उतार दिया। इससे चीन में प्रॉपर्टी बाज़ार धराशायी हो गया, चीन में बने भुतहा शहरों में कोई बसना नहीं चाहता, इस समय चीन में 9 करोड़ से ज्यादा मकान खाली पड़े हैं, इन मकानों में पूरी फ्रांस की आबादी से ज्यादा लोग रह सकते हैं। ये पैसा चीन के रीयल एस्टेट ने प्रॉपर्टी में लगाया लेकिन बुलबुले के फूटने के बाद इन्हें कोई खरीदार नहीं मिल रहा है, जिसका असर बैंकों पर पड़ा, प्रॉपर्टी बाज़ार में पैसा चीन के राष्ट्रीय बैंकों ने लगाया था और उन्हें निवेशित धनराशि वापस नहीं मिल रही है।
चीन ने वर्ष 2013 में अपनी मतहत्वाकांक्षी परियोजना बेल्ट एंड रोड को लांच किया था, इसके तहत चीन अपने प्राचीन व्यापारिक रेशम मार्ग को एक बार फिर से शुरु करना चाहता था, ये भूमि और समुद्र दोनों तरफ़ था, इसके तहत चीन ने पूरे अफ्रीकी महाद्वीप, दक्षिण-पूर्वी एशिया, भारत को छोड़कर दक्षिण एशिया, पूर्वी और मध्य यूरोपीय देश, लगभग पूरा लैटिन और मध्य अमेरिका में भारी धन निवेश किया। लेकिन इनमें से कई देशों की अर्थव्यवस्था उस रफ़्तार से नहीं चली जैसा इनके बारे में सोचा गया था। इन देशों से चीन को कोई पैसा वापस नहीं मिला, कुछ देश चीन के कर्ज़जाल में फंस गए और उनके बंदरगाह, अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डे, खनिजों की खदानें चीन ने 99 वर्ष के लिये पट्टे पर ले लीं। इनमें श्रीलंका का हम्बनटोटा बंदरगाह, अफ़्रीका में ज़ाम्बिया और मोज़ाम्बीक की खदानें, युगांडा का एंटेबी अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डा प्रमुख है। पाकिस्तान का ग्वादर बंदरगाह भी उसी राह पर है। जो देश चीन के कर्ज़जाल में फंसे हैं उनमें जिबूती, लाओस, ज़ाम्बिया, किर्गिज़स्तान, श्रीलंका, पाकिस्तान के नाम सबसे पहले आते हैं।
चीन की अंदरूनी हालत इस समय बहुत खराब है, वहां पर बेरोज़गारी दर जुलाई के महीने में बढ़कर 20 फीसदी हो गई जो सबसे ऊंची है, जो युवा काम कर रहे हैं उनपर काम का दबाव सबसे अधिक है, लेकिन इसका उन्हें कोई लाभ नहीं मिल रहा है, इन युवाओं ने थांगफिंग और बाईलान की नीति अपनाई है, यानी चीज़ों को सड़ने दो और बिना चिंता के लेट जाओ और आराम करो, चीन का युवा ऐसा इसलिये कर रहा है क्योंकि उसके ऊपर काम का बहुत दबाव है, लेकिन उसे पैसे ज्यादा नहीं मिल रहे हैंजिससे वो अपने मकान का किराया नहीं दे पा रहे हैं, अपने खर्चे नहीं चला सकते। ये समस्या इतनी गंभीर हो गई कि चीन के राष्ट्रपति शी चिनफ़िंग को खुद आकर ये कहना पड़ा कि युवाओं को काम पर लौटना चाहिए, युवा ही चीन का भविष्य हैं उन्हें ये कहना पड़ा कि युवाओं को चीन के आदर्शों से सीख लेना चाहिए और काम करना चाहिए।
महंगाई दर भी ऊंची है, खाद्य पदार्थों काउपभोक्ता मूल्य सूचकांक बढ़कर 8.8 फ़ीसदी हो गया है वहीं सकल घरेलू उत्पाद दर 3.2 फीसदी है। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि चीन की अर्थव्यवस्था किस दिशा में बढ़ चली है। चीन ने अपने देश के सबसे बड़े उद्योगपतियों में से एक अलीबाबा के मालिक मा युईन या जैक मा को राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर कई दिनों तक बंधक बना कर रखा था जिससे अलीबाबा को 26 अरब डॉलर का नुकसान हुआ। शी चिनफ़िंग अपने देश के व्यापारियों को ये दिखाना चाहते थे कि चीन में इस समय भी कम्युनिस्ट पार्टी से बड़ा कोई भी नहीं है। इसका नतीजा ये निकला कि चीन से अमीर लोग अपना पैसा लेकर परिवार के साथ दूसरे देशों में भाग रहे हैं, ये लोग ऑस्ट्रेलिया, आयरलैंड, अमेरिका, इंग्लैंड, कनाडा, स्पेन, साइप्रस जैसे देशों में भाग रहे हैं, इनमें से कुछ देशों ने अपनी अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिये विदेश से अमीर नागरिकों को अपने यहां आकर बसने, व्यापार करने की छूट दी है।
चीन ने औद्योगिकरण के चलते इतने पेड़ों की कटाई की है, अपनी विशाल आबादी का पेट भरने के लिये खेतों में इतना पेस्ट और यूरिया डाला है कि चीन की 20 फीसदी कृषि भूमि बंजर हो गई है, एक चौथाई भूमिगत जलाशय ज़हरीले हो गए हैं जिनका पानी पीते ही लोगों के मर जाने का खतरा है, इस वर्ष 2022 में चीन में गरमी का मौसम अपेक्षाकृत लंबा था और पहले के गरमी के मौसम की तुलना में तापमान बहुत अधिक था, इससे यांगत्ज़ी नहीं का डेल्टा सूख गया जिससे चीन के जलाशय और बांध भी खाली हो गए इससे चीन में बिजली संकट पैदा हो गया, शांगहाई, हांगचो, क्वानचौ समेत मध्य और पूर्वी चीन के कई शहरों में बिजली गुल रही, सरकार को शॉपिंग मॉल और कार्यालय बंद करना पड़ा, लोगों से अपने घरों से काम करने को कहा गया और एयरकंडिशनर न चलाने की हिदायत दी गई जिससे बिजली की बचत हो सके। वर्ष 1978 में चीन के जिन इलाकों में बिजली आई थी उसके बाद से अब पहली बार बिजली जाने की बात सुनी जा रही है, इससे पहले चीन में कभी बिजली का कोई संकट नहीं हुआ था। इसके अलावा चीन के अंदर शिनच्यांग वेवूर स्वायत्त प्रांत, तिब्बत स्वायत्त प्रांत, इनर मंगोलिया, हांगकांग, मकाओ में चीनी सत्ता के खिलाफ़ जो आंदोलन हो रहे हैं उससे चीनी तानाशाह परेशान है, तो वहीं तानाशाह ने भारत समेत अपने कई पड़ोसियों से झगड़ा मोल लेकर उनसे संबंध खराब कर लिया है। ऊपर से लोगों का उसके खिलाफ़ प्रदर्शन भी चीनी हुक्मरानों को नाराज़ कर रहा है। लोग सड़कों पर हैं और तानाशाह से गद्दी छोड़ने की मांग कर रहे हैं, तानाशाह अपनी ज़िद पर अड़ा हुआ है। पिछले दो दिनों से चीन में कोई आंदोलन नहीं हो रहा है, सीपीसी और सुरक्षा कर्मियों ने सभी का मुंह बंद कर शांत ज़रूर कर दिया है लेकिन ये शांति किसी तूफ़ान के आने से पहले वाली शांति नज़र आ रह है, जानकारों की राय में आने वाले कुछ सप्ताह या महीनों में चीन में एक बड़े बवाल की आशंका है।